त्रिपुरा विधानसभा में चिटफंड मुद्दे पर हंगामा
अगरतला। त्रिपुरा विधानसभा में विपक्ष के शोरशराबे के कारण सोमवार को कार्यवाही बाधित हुई। विपक्ष सरकार से अवैध एनबीएफसी या चिटफंड द्वारा जुटाए गए धन की जानकारी सदन को देने की मांग कर रहा था। विधानसभा अध्यक्ष और संबंधित मंत्री ने मांग को जब अनसुना कर दिया, तब पूरा विपक्ष सदन के बीचोबीच खड़ा हो गया, जिसके कारण अध्यक्ष रामेंद्र चंद्र देबनाथ को प्रश्नकाल स्थगित करना पड़ा।
विपक्षी कांग्रेस की मांग पर प्रतिक्रिया देते हुए कार्यवाहक गृह मंत्री बादल चौधरी ने कहा, “त्रिपुरा की वामपंथी सरकार देश पहली राज्य सरकार है जिसने चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की है और ऐसी गतिविधियों से निपटने के लिए कानून पारित किया है।” उन्होंने कहा, “त्रिपुरा सरकार ने 2013 में 37 मामलों की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराने को कहा था, लेकिन एजेंसी ने सिर्फ पांच को ही अपने हाथ में लिया है।”
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पिछले साल लिखे पत्र में सीबीआई को चिटफंड कंपनियों की गतिविधियों और पूर्वोत्तर राज्यों में अवैध तरीके से धन जुटाने की जांच के निर्देश देने की मांग की थी। सरकार ने अपने एक पत्र में लिखा था, “सभी 37 मामलों की सीबीआई जांच जरूरी है, क्योंकि इन कंपनियों का विभिन्न राज्यों में काम चल रहा है।” इसकी प्रति चौधरी ने मीडिया में जारी की।
उन्होंने कहा, “त्रिपुरा की वामपंथी सरकार देश की पहली राज्य सरकार है जिसने अनधिकृत गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों(एनबीएफसी) की अवैध गतिविधियों की सीबीआई जांच की मांग की है।” मंत्री ने कहा, “हमारी राज्य सरकार ने सभी आठों जिलों के पुलिस प्रमुखों अधीन आर्थिक अपराध शाखा का गठन अवैध एनबीएफसी और चिटफंड कंपनियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने के लिए किया है।”
चौधरी ने हालांकि, कहा कि राज्य सरकार ने केंद्र से 2002 में अवैध चिटफंडों को नियमित करने के लिए समग्र केंद्रीय विधेयक लाने का अनुरोध किया था, जिस पर केंद्र ने सकारात्मक जवाब नहीं दिया। इसलिए त्रिपुरा ने 2011 में ऐसे संगठनों से निपटने के लिए कानून पारित किया। विपक्ष के नेता सुदीप रॉय बर्मन ने संवाददाताओं से कहा कि चिटफंड कंपनियों ने कम से कम 1500 करोड़ रुपये त्रिपुरा की जनता से इकट्ठा किया है।
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